खैरागढ़। सोनेसरार भूमि विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राजस्व अभिलेखों में सुधार और न्यायालयीन आदेशों के पालन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मनीष सोनी द्वारा कलेक्टर को आवेदन सौंपे जाने के बाद अब इसी प्रकरण से जुड़े बालमुकुंद सोनी ने तहसीलदार खैरागढ़ को लंबा और विस्तृत ज्ञापन देकर राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बालमुकुंद सोनी का दावा है कि वर्ष 2006 से 2026 तक विभिन्न न्यायालयों, लोक अदालत और राजस्व अधिकारियों द्वारा उनके पक्ष में रिकॉर्ड कई बार प्रमाणित किया गया, बावजूद इसके संबंधित पटवारी ने आदेशों का पालन नहीं किया। उनका आरोप है कि इसी वजह से विवाद समाप्त होने के बजाय और उलझता गया।
न्यायालयीन आदेशों के बाद भी नहीं हुई रिकॉर्ड दुरुस्ती
ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि अपर जिला एवं सत्र न्यायालय खैरागढ़ के 26 अक्टूबर 2013 और 22 दिसंबर 2015 के आदेशों में खसरा नंबर 182/1 और 182/3 को पृथक-पृथक दर्शाते हुए उनके नाम रिकॉर्ड प्रमाणित किया गया था। इसके बाद 26 नवंबर 2018 के ज्ञापन और 9 मार्च 2019 के राष्ट्रीय लोक अदालत के निर्णय में भी इन अभिलेखों की पुष्टि की गई। सोनी के अनुसार 24 मार्च 2015 को तहसीलदार ने स्थल निरीक्षण कर पूर्व की त्रुटि स्वीकार की थी और निर्देश दिया था कि रिकॉर्ड केवल खसरा 182/1 में सुधारा जाए। इसके बावजूद सुधार लागू नहीं किया गया और 182/6 से संबंधित प्रविष्टियां बनी रहीं, जिन्हें बाद में न्यायालय ने निरस्त कर दिया था।
निरस्त खसरे के आधार पर फर्जी रजिस्ट्री का आरोप
ज्ञापन में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि निरस्त खसरा 182/6 के आधार पर 18 अगस्त 2021 को कथित रूप से रजिस्ट्री कराई गई। सोनी का कहना है कि यह कार्रवाई न्यायालयीन आदेशों के विपरीत थी और इससे उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक क्षति हुई है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि खसरा 182/2 पहले से ही शासकीय भूमि (नहर/नाली) के रूप में दर्ज है, जिसे निजी स्वामित्व में दर्शाने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। इस संदर्भ में 2020 में अनुविभागीय अधिकारी द्वारा नामांतरण आवेदन निरस्त किए जाने का हवाला भी दिया गया है।
दस बार रिकॉर्ड प्रमाणित, फिर भी विवाद जारी”
बालमुकुंद सोनी का दावा है कि वर्ष 2006 से 2021 तक कम से कम दस अलग-अलग अवसरों पर न्यायालय, लोक अदालत और राजस्व अधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड उनके पक्ष में प्रमाणित किया जा चुका है। फरवरी 2026 के तहसीलदार ज्ञापन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि स्थल निरीक्षण में भूमि उनके कब्जे में पाई गई और अन्य पक्ष उच्च न्यायालयीन आदेश प्रस्तुत नहीं कर सके। उन्होंने आरोप लगाया कि आदेशों के बावजूद रिकॉर्ड में हेरफेर जारी है और यह मामला अब सामान्य सिविल विवाद से आगे बढ़कर आपराधिक स्वरूप ले चुका है।
अनहोनी की आशंका, प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग
सोनी ने अपने आवेदन में संभावित अप्रिय घटना की आशंका जताते हुए कहा है कि यदि भूमि विवाद के कारण कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए संबंधित पटवारी एवं राजस्व विभाग जिम्मेदार होंगे। उन्होंने पुलिस प्रशासन को भी पूर्व सूचना देने का दावा किया है। अंत में उन्होंने मांग की है कि न्यायालय के सभी आदेशों का तत्काल पालन कराया जाए, संबंधित पक्षों से वैध दस्तावेज प्रस्तुत कराए जाएं और एक सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट की जाए। लगातार आ रहे आवेदन और आरोपों के बाद यह मामला प्रशासनिक स्तर पर गंभीर होता जा रहा है। कलेक्टर कार्यालय से लेकर तहसील स्तर तक शिकायतें पहुंचने से राजस्व विभाग की भूमिका पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर क्या ठोस कार्रवाई करता है।

