मोहला-मानपुर। ग्राम उमरपाल में आयोजित एक पारंपरिक विवाह समारोह के दौरान ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने न सिर्फ वहां मौजूद लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया, बल्कि एक विलुप्तप्राय सांस्कृतिक परंपरा को फिर से जीवंत कर दिया। मौका था – मांदरी नृत्य के पुनः प्रदर्शन का, जो वर्षों से गांवों में धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी।
बांस की लय, ढोल की थाप और मनमोहक गीतों के साथ जब पुरुषों और महिलाओं ने वृत्ताकार होकर एक-दूसरे का हाथ थाम नृत्य करना शुरू किया, तो पूरा माहौल एक सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील हो गया। मांदरी नृत्य केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिवासी जीवनदर्शन का दर्पण है – जिसमें जल, जंगल और जमीन के प्रति आस्था, सामूहिकता का बोध और प्रकृति से तादात्म्य झलकता है।
नृत्य प्राचीनकाल से ही आदिवासी समाज में पर्व-त्योहार, फसल उत्सव और सामाजिक आयोजनों में उत्साह और उल्लास का माध्यम रहा है। इसके गीतों में लोकजीवन की कहानियां, पर्यावरणीय संदेश और सामूहिक संघर्ष की गाथाएं गूंजती हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले हर पर्व पर मांदरी अनिवार्य रूप से होता था, लेकिन अब यह परंपरा तेजी से सिमटती जा रही है।
ग्रामीणों की मानें तो आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल संस्कृति और शहरीकरण के प्रभाव ने युवाओं को अपनी जड़ों से काट दिया है। मांदरी जैसे नृत्य अब सिर्फ यादों में बचे हैं। बुजुर्गों ने चिंता जताई कि अगर यह सांस्कृतिक विरासत अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंची, तो आने वाले वर्षों में यह सिर्फ दस्तावेजों तक सीमित रह जाएगी।

