खैरागढ़। शिक्षा और संस्कार की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वालीं प्रेम कुमार सरस्वती शिशु मंदिर की पूर्व प्रधानाचार्य सुश्री राजलक्ष्मी सिंह, जिन्हें पूरा खैरागढ़ स्नेह से ‘राज दीदी’ कहता था, सोमवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं। देर रात करीब 12:30 बजे उनके निधन की खबर से शिक्षा जगत सहित पूरे नगर में शोक की लहर दौड़ गई। सोमवार को अंतिम यात्रा से पहले उनके पार्थिव देह को उसी विद्यालय में लाया गया, जिसे उन्होंने अपने जीवन के लगभग 55 वर्ष समर्पित किए थे। यहां शिक्षकों, समिति सदस्यों और विद्यार्थियों ने नम आंखों से अपनी प्रिय ‘राज दीदी’ को अंतिम श्रद्धांजलि दी।
जिस विद्यालय को जीवन दिया, वहीं हुई अंतिम विदाई
राजलक्ष्मी सिंह का सरस्वती शिशु मंदिर से रिश्ता महज नौकरी का नहीं, बल्कि जीवनभर के समर्पण और आत्मीयता का था। विद्यालय की शुरुआत से लेकर अपने अंतिम समय तक वे संस्था से जुड़ी रहीं। वर्षों तक जिनकी आवाज से विद्यालय में प्रार्थना, अनुशासन और शिक्षा की शुरुआत होती थी, सोमवार को उसी परिसर में उनकी अंतिम विदाई का दृश्य हर किसी को भावुक कर गया। पार्थिव देह के विद्यालय पहुंचते ही शिक्षक, समिति सदस्य और विद्यार्थी भावुक हो उठे। विद्यार्थियों ने पुष्प अर्पित कर अपनी गुरु को श्रद्धांजलि दी। कई आंखें नम थीं तो कई चेहरों पर राज दीदी के साथ बिताए वर्षों की यादें साफ दिखाई दे रही थीं।
विद्यार्थियों ने दी सलामी, शांति पाठ से गूंजा विद्यालय परिसर
‘राज दीदी’ को अंतिम श्रद्धांजलि देते हुए विद्यार्थियों ने उन्हें सलामी दी। इसके बाद विद्यालय परिवार और विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से शांति पाठ किया। इस दौरान पूरा परिसर भावनाओं से भर गया। जिन बच्चों को राज दीदी ने वर्षों तक अपने बच्चों की तरह स्नेह, अनुशासन और संस्कार दिए, वही विद्यार्थी सोमवार को उन्हें अंतिम बार श्रद्धा से निहार रहे थे। उनके लिए राज दीदी केवल प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि गुरु, अभिभावक और जीवन की दिशा दिखाने वाली मार्गदर्शक थीं।
शिशु मंदिर से लालपुर मुक्तिधाम तक उमड़ा जनसैलाब
विद्यालय में श्रद्धांजलि और शांति पाठ के बाद अंतिम यात्रा लालपुर मुक्तिधाम के लिए रवाना हुई। अंतिम यात्रा में खैरागढ़ नगर के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। शिक्षा जगत, सामाजिक क्षेत्र, विभिन्न संस्थाओं से जुड़े लोगों के अलावा बड़ी संख्या में आम नागरिकों ने भी अंतिम यात्रा में शामिल होकर अपनी प्रिय ‘राज दीदी’ को अंतिम विदाई दी।
भतीजे भागवत शरण सिंह ने दी मुखाग्नि
लालपुर मुक्तिधाम में गमगीन माहौल के बीच राजलक्ष्मी सिंह का अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि उनके भतीजे, सांसद प्रतिनिधि, जिला स्काउट गाइड के जिला मुख्य आयुक्त एवं समाजसेवी भागवत शरण सिंह ने दी. इस दौरान परिजन, शिक्षक, विद्यार्थी, सामाजिकजन और नगरवासी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। ‘राज दीदी’ को खोने का दर्द हर चेहरे पर साफ नजर आया।
55 साल की गुरु सेवा, हजारों विद्यार्थियों के जीवन में छोड़ी अमिट छाप
राजलक्ष्मी सिंह ने करीब 55 वर्षों तक शिक्षा और संस्कार की अलख जगाई। उन्होंने कई पीढ़ियों को न केवल किताबों का ज्ञान दिया, बल्कि अनुशासन, संस्कार, नैतिकता और जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता भी दिखाया।उनके पढ़ाए विद्यार्थी आज न्यायपालिका, वकालत, पुलिस प्रशासन, चिकित्सा, पत्रकारिता, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। उनके शिष्य आज भी उन्हें अपनी सफलता के पीछे खड़ी गुरु और मार्गदर्शक शक्ति के रूप में याद करते हैं।
गरीब बच्चों की फीस अपनी तनख्वाह से भरती थीं राज दीदी
राजलक्ष्मी सिंह का हृदय आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से संवेदनशील था। उन्होंने कई जरूरतमंद बच्चों की फीस अपनी तनख्वाह से जमा की, ताकि आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई बाधित न हो। विद्यालय के अतिरिक्त कक्ष के निर्माण के लिए भी उन्होंने अपने वेतन का बड़ा हिस्सा दान किया था। उनका जीवन इस बात की मिसाल रहा कि शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के निर्माण में अपना सर्वस्व लगा देता है।
‘राज दीदी’ नहीं रहीं, लेकिन उनके संस्कार हमेशा जीवित रहेंगे
राजलक्ष्मी सिंह का निधन खैरागढ़ के शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपना पूरा जीवन विद्यार्थियों के भविष्य और शिक्षा-संस्कार को समर्पित कर दिया। आज ‘राज दीदी’ पंचतत्व में विलीन हो गईं, लेकिन उनके दिए संस्कार, उनके पढ़ाए हजारों विद्यार्थी और शिक्षा के प्रति उनका समर्पण उन्हें हमेशा जीवित रखेगा। जिस विद्यालय में उन्होंने हजारों बच्चों के भविष्य की नींव रखी, उसी विद्यालय से निकली उनकी अंतिम यात्रा उनके 55 वर्षों के शिक्षा-समर्पित जीवन की सबसे मार्मिक तस्वीर बन गई। राज दीदी चली गईं, लेकिन खैरागढ़ की कई पीढ़ियों की स्मृतियों में उनका स्नेह, अनुशासन और संस्कार हमेशा जीवित रहेगा।

