सोन कुमार सिन्हा | डोंगरगढ़ - छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत को पहचान दिलाने वाले कई लोकप्रिय गीतों के रचयिता, देश के नामचीन गायकों के लिए गीत लिखने वाले गीतकार आशु बख्शी (संतोष बख्शी) आज गुमनामी और संघर्षपूर्ण जीवन जीने को विवश हैं। मां बमलेश्वरी देवी की पावन नगरी डोंगरगढ़ में जन्मे आशु बख्शी ने छत्तीसगढ़ी भाषा को समर्पित कई ऐसे गीत लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं। आशु बख्शी बताते हैं कि उन्हें गीतकार बनने की प्रेरणा अपनी माता स्व. विंध्यवासिनी बख्शी से मिली। माता ने अपने अंतिम दिनों में उनसे कहा था— “तू लिख, तू अच्छा लिखेगा”। यह बात उनके निधन से मात्र सवा महीने पहले की है। माता का देहांत 11 अक्टूबर 1989 को हुआ था। उनके पिता गोपाल कृष्ण बख्शी ट्यूशन आदि कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। आर्थिक तंगी के कारण आशु बख्शी स्नातक की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और बी-कॉम प्रीवियस तक ही शिक्षा हो पाई। जीवन की तलाश उन्हें मुंबई ले गई, जहां कुर्ला वेस्ट में एक वॉटर सप्लाई कंपनी में नौकरी की। इस दौरान वे कई बार निराश होकर वापस लौटे, यहां तक कि दो बार पीलिया जैसी गंभीर बीमारी से भी जूझे। लेकिन हार नहीं मानी। आखिरकार उन्हें संगीत के क्षेत्र में अवसर मिला। भजन सम्राट अनूप जलोटा ने उनके लिखे छह हिंदी गणेश भजनों को आवाज दी, जो देवों में देव सीरीज में रिलीज हुए। कुमार सानू और छत्तीसगढ़ी सिनेमा वर्ष 2004 में आई छत्तीसगढ़ी फिल्म तोर संग जीना संगी, तोर संग मरना के लिए लिखा गया गीत खिल गे मन के फूल जिसे प्रसिद्ध पार्श्वगायक कुमार सानू ने गाया। यह फिल्म निर्माता नरेश अग्रवाल एवं दिनेश अग्रवाल के बैनर तले बनी थी और उस दौर में कैसेट माध्यम से रिलीज हुई। डोंगरगढ़ की जे.आई. कैसेट कंपनी सहित अन्य माध्यमों से आशु बख्शी के लिखे कई भक्ति गीत रिलीज हुए, जिनमें ऊंचा तेरा दरबार मां बमलेश्वरी, मां बमलेश्वरी की नगरिया” जैसे लोकप्रिय गीत शामिल हैं। इसके अलावा ग्वाला प्रोडक्शन की फिल्म “माया के मंदिर” के लिए उन्होंने टाइटल सॉन्ग भी लिखा। उनकी सबसे चर्चित कृति “मोर छत्तीसगढ़ के माटी, भारत मां के साटी” रही। इस एल्बम में छेरछेरा, होली, दशहरा और “छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया” जैसे छह उत्कृष्ट गीत शामिल थे। इसका विमोचन 15 अक्टूबर 2012 को रायपुर के प्रेस क्लब, मोती गार्डन में प्रख्यात निर्देशक-लेखक सतीश जैन द्वारा किया गया। संगीतकार अर्नब चटर्जी (मुंबई निवासी, मूलतः बिलासपुर) ने इन गीतों को संगीतबद्ध किया। 12 मार्च 2025 को आशु बख्शी की धर्मपत्नी स्व. इंदिरा वर्मा का निधन हो गया। पत्नी शिक्षा कर्मी थीं। इसके बाद पारिवारिक विवादों और दस्तावेजी अड़चनों के कारण उन्हें पेंशन और अन्य शासकीय लाभों में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। आधार कार्ड तक में नाम दर्ज न होने दिया गया। काफी प्रयासों के बाद एफिडेविट के माध्यम से अब कुछ राहत मिली है। आशु बख्शी ने यूट्यूब पर भी संगीत यात्रा शुरू की, कोरोना काल में जागरूकता गीत लिखे।
छत्तीसगढ़ी फिल्म “रायपुर के किशोर कुमार” पर काम शुरू किया, लेकिन प्रोड्यूसर और मजबूत प्रोडक्शन सहयोग के अभाव में यह प्रोजेक्ट अधूरा रह गया। कम लोग जानते हैं कि आशु बख्शी, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के वंशज हैं, जो उनके परदादा लगते हैं।
एक पीड़ा भरी पंक्ति अपनी स्थिति को बयान करते हुए आशु बख्शी कहते हैं कोशिशें करता हूं बार-बार और तैयार होता हूं,
मगर मेरे काम का दफ्तर हमेशा बंद रहता है। कई सालों से छुट्टियां मना रहा हूं इस तरह जैसे हर दिन इतवार होता है…आज जरूरत है कि ऐसे सच्चे रचनाकारों को समाज, शासन और सांस्कृतिक संस्थाओं से वह सम्मान और सहयोग मिले, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

