सोन कुमार सिन्हा | राजनांदगांव - जिले के बोरतलाव थाना क्षेत्र से सामने आया नाबालिग बालिका से जुड़े यौन शोषण का मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है बल्कि यह चिकित्सा व्यवस्था, कानून के पालन और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। थाना प्रभारी के अनुसार पीड़िता की मां ने चौकी चिचोला में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि गांव के ही एक नाबालिग लड़के ने उसकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसला कर शारीरिक संबंध बनाए जिससे वह गर्भवती हो गई। लोकलाज के भय से शुरुआत में मामला दर्ज नहीं कराया गया और बच्ची को रिश्तेदार के घर भेज दिया गया। डिलिवरी के बाद पीड़िता के चाचा-चाची द्वारा नवजात को किसी अन्य जरूरतमंद को देने की बात सामने आई। चूंकि घटना स्थल बोरतलाव थाना क्षेत्र का था, इसलिए विवेचना वहीं स्थानांतरित की गई। पुलिस अधीक्षक राजनांदगांव सुश्री अंकिता शर्मा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र नायक एवं एसडीओपी डोंगरगढ़ आशीष कुंजाम के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी बोरतलाव अवनीश कुमार श्रीवास द्वारा टीम गठित की गई। दिनांक 8 जनवरी को मुखबिर की सूचना पर विधि से संघर्षरत बालक को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, जहां उसने जुर्म स्वीकार किया। इसके बाद उसे न्यायिक अभिरक्षा में बाल संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया। पुलिस का कहना है कि अन्य आरोपियों पर भी विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी। नाबालिग से अनैतिक कृत्य का आरोपी बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया, मामला यहीं खत्म नहीं होता। जांच में सामने आया है कि डोंगरगढ़ क्षेत्र की 15 वर्षीय नाबालिग की 8 सितंबर को डिलिवरी राजनांदगांव के कृष्णा हॉस्पिटल में हुई। आरोप है कि यह डिलिवरी एक शासकीय मेडिकल कॉलेज में पदस्थ डॉक्टर द्वारा निजी अस्पताल में की गई। सूत्रों के अनुसार, जन्मा शिशु अपरिपक्व (अनमैच्योर) था और डिलिवरी के बाद नवजात को उसकी मां से अलग कर दिया गया। इसके बाद बच्चे के बेचे जाने की गंभीर आशंका जताई जा रही है। कानून के अनुसार नाबालिग गर्भवती के मामले में पुलिस को पूर्व सूचना देना अनिवार्य है . चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है लेकिन इस मामले में न तो पुलिस को सूचना दी गई और न ही POCSO एक्ट का पालन हुआ। सोनोग्राफी करने वाले डॉक्टर की भूमिका भी जांच के घेरे में है। पूरा मामला तब उजागर हुआ जब महोबे हॉस्पिटल में दूसरे माता-पिता बनकर नवजात का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने का प्रयास किया गया। चूंकि वहां डिलिवरी नहीं हुई थी, इसलिए आपत्ति दर्ज की गई और मामला प्रशासन तक पहुंच गया. जानकारी कलेक्टर तक पहुंचने के बाद जांच टीम गठित की गई है। सभी संबंधित अस्पतालों के डॉक्टरों के बयान लिए जा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कृष्णा हॉस्पिटल के अहम रिकॉर्ड गायब बताए जा रहे हैं, जो साजिश की ओर इशारा करते हैं। सूत्रों का दावा है कि एक कथित मीडिया कर्मी द्वारा राशि लेकर मामला दबाने की कोशिश की गई। यदि यह आरोप सही पाया गया, तो यह न केवल अपराध बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी गंभीर आघात होगा। यह मामला केवल एक अपराध नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और सामाजिक जिम्मेदारी की परीक्षा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच कागज़ों तक सीमित रहती है या दोषियों तक कानून का शिकंजा कसता है।
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